भारतीय समाज की विशेषताएं बताइए?

प्रस्तावना :-

भारतीय समाज और उसकी संस्कृति मानव समाज की अनमोल निधि है। विश्व की किसी संस्कृति को यदि अमर कहा जा सकता है तो निस्संदेह वह भारतीय संस्कृति है, जिसने अपनी आभा और प्रतिभा के साथ प्राचीन काल से ही अपनी स्थिरता बनाए रखी है। अपने लंबे इतिहास में, भारतीयों ने एक सामाजिक व्यवस्था और संस्कृति विकसित की है जो मौलिक, अद्वितीय और दुनिया की अन्य संस्कृतियों और सामाजिक व्यवस्थाओं से अलग है। यहां हम भारतीय समाज की विशेषताएं का उल्लेख करेंगे, जो हजारों वर्षों से भारतीय समाज से जुड़ी हुई हैं।

समाजशास्त्र में समाज एक महत्वपूर्ण और प्राथमिक अवधारणा है। सामान्य अर्थ में समाज को व्यक्तियों के समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, परन्तु समाजशास्त्रीय दृष्टि से केवल व्यक्तियों के समूह को ही समाज नहीं कहा जा सकता। जब तक कि ऐसे व्यक्तियों के बीच किसी प्रकार का सामाजिक संबंध न हो। मैकाइवर ने समाज को परिभाषित करते हुए यही कहा है। “समाज सामाजिक सम्बन्धों का जाल है।” अर्थात् समाज को सामाजिक सम्बन्धों की वह व्यवस्था माना जाता है जिसमें और जिसके साथ हम रहते हैं।

आवश्यकता की पूर्ति के लिए समाज में संस्थाओं की व्यवस्था है। इन संस्थाओं और उनके संगठन की प्रकृति उस समाज की संस्कृति द्वारा निर्धारित और संगठित होती है। इसलिए किसी भी समाज की संरचना और संस्कृति में एकता और विविधता का अवलोकन करने के लिए उसकी सांस्कृतिक विशेषताओं का अध्ययन करना आवश्यक हो जाता है।

भारतीय समाज की विशेषताएं :-

सबसे प्राचीन और स्थायी –

भारत की संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था सबसे पुरानी और स्थिर है। समय के साथ-साथ मिस्र, सीरिया, यूनान, रोम आदि देशों की संस्कृतियाँ नष्ट हो गयीं और उनके अवशेष शेष रह गये, किन्तु हजारों वर्षों के बाद भी भारत की प्राचीन संस्कृति एवं सामाजिक व्यवस्था आज भी जीवित है।

आज भी हम वैदिक धर्म को मानते हैं। यज्ञ, हवन, विवाह जैसे आयोजनों में पवित्र वैदिक मंत्रों का प्रयोग होता है। ग्राम पंचायत, जाति व्यवस्था, संयुक्त परिवार व्यवस्था आज भी परिवर्तित रूप में विद्यमान है। गीता, बुद्ध और महावीर, अध्यात्मवाद, प्रकृति-पूजा, पतिव्रत धर्म, कर्म के सिद्धांत, अहिंसा और अस्तेय के सिद्धांत आज भी इस देश के लोगों को प्रेरित करते हैं।

समन्वयात्मक प्रवृत्ति –

भारतीय समाज की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता इसकी समन्वयवादी प्रवृत्ति है। जनजातियों, हिन्दुओं, मुसलमानों, शकों, हूणों, ईसाइयों आदि विभिन्न सांस्कृतिक विविधताओं के प्रभाव से भारतीय संस्कृति नष्ट नहीं हुई है, बल्कि उनमें समन्वय और एकता स्थापित हो गई है। अतः कहा जा सकता है कि भारतीय समाज और संस्कृति में समन्वय की अपार शक्ति है।

आध्यात्मिकता –

धर्म और अध्यात्म भारतीय समाज और संस्कृति की आत्मा हैं। भारतीय समाज में भौतिक सुख-सुविधाएं जीवन का लक्ष्य कदापि नहीं हैं। यहाँ आत्मा और ईश्वर के महत्व को स्वीकार किया गया है। और भौतिक सुख के स्थान पर मानसिक और आत्मिक सुख को सर्वोपरि माना गया है। भोग और त्याग का सुन्दर समन्वय है।

सहनशीलता –

भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता इसकी सहनशीलता है। भारत में सभी धर्मों, जातियों, प्रजातियों और संप्रदायों के प्रति उदारता, सहिष्णुता और प्रेम पाया जाता है। भारत समय-समय पर कई वाह्य संस्कृतियों के प्रभाव में रहा, लेकिन इसने खंडन या बहिष्कार के बजाय समान रूप से फलने-फूलने के अवसर पैदा किए। धर्म, जाति, प्रजाति के आधार पर कभी कोई अमानवीय व्यवहार नहीं हुआ।

धार्मिक प्रभुत्व –

भारतीय समाज धार्मिक है। वेद, उपनिषद, पुराण, महाभारत, गीता, रामायण, कुरान और बाइबिल का यहां के लोगों के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा है। इन महान ग्रन्थों ने लोगों को आशावाद, आस्तिकता, त्याग, तपस्या, संयम आदि का पाठ पढ़ाया है, जो कर्म और जीवन पद्धति में दिखाई देते हैं।

विचार और आदर्श –

भारतीय समाज के कुछ ऐसे तत्व हैं जो हमेशा से ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का आधार रहे हैं। सादा जीवन उच्च विचार, ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, ‘जियो और जीने दो’ आदि ऐसे विचार और आदर्श हैं जो दुनिया को एकता का पाठ पढ़ाते हैं और सबको एक सूत्र में बांधते हैं।

कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत –

भारतीय समाज में कर्म को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ऐसा माना जाता है कि इस लोक में ही नहीं बल्कि परलोक में भी अच्छे कर्मों से ही उत्तम फल प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांत से व्यक्ति को हमेशा अच्छे कर्म करने के लिए प्रेरित किया जाता रहा है।

वर्णाश्रम और पुरुषार्थ –

प्राचीन भारतीय समाज और संस्कृति की उल्लेखनीय विशेषता वर्णाश्रम व्यवस्था है। इस व्यवस्था में समाज में श्रम विभाजन के लिए चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र का निर्माण किया गया। ब्राह्मण समाज ज्ञान और शिक्षा और क्षत्रिय शक्ति का प्रतीक है। वैश्य भरण पोषण तो शुद्ध समाज सेवा से जुड़ा है। वर्ण व्यवस्था के साथ, चार आश्रम हैं – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। ब्रह्मचर्य आश्रम जीवन की वह अवस्था है जो पढ़ने, लिखने और अविवाहित जीवन से जुड़ी होती है।

गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति जीविकोपार्जन करता है और परिवार का पालन-पोषण करता है। वानप्रस्थ में व्यक्ति घर, परिवार और गांव को छोड़कर जंगल के लिए निकल जाता है और इंद्रियों को नियंत्रित करता है। संन्यास आश्रम जीवन का अंतिम पड़ाव है। इसमें व्यक्ति मोक्ष के लिए प्रयास करता है।

इन सभी आश्रमों का उद्देश्य मनुष्य के धर्म, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थ को पूरा करना है। जिससे जातक का सामाजिक और व्यवहारिक जीवन संभव हो सके। यद्यपि उनका रूप और कार्य बदल गया है, फिर भी वे मानव जीवन को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भारतीय समाज एवं संस्कृति की अपनी मौलिक विशेषताएँ हैं जिसके कारण भारतीय समाज एवं संस्कृति में सदैव एकता रही है।

संक्षिप्त विवरण :-

भारतीय समाज न केवल प्राचीन है बल्कि इसमें स्थिरता के गुण भी हैं। समन्वय और सहिष्णुता, कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धांतों और आदर्शों ने इसे स्थिरता प्रदान की और साथ ही इसे बदलते परिवेश में समायोजित करने में सक्षम बनाया। इसीलिए भारतीय समाज सदैव गतिशील रहा है।

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