नगरीयता एक जीवन शैली है का विस्तृत वर्णन कीजिए।

नगरीयता की अवधारणा :-

नगरीयता एक अवधारणा है जो नगरीय जीवन शैली को परिभाषित करती है। शहरी जीवन का तात्पर्य नगरीय संगठन, संगठन के प्रकार, मूल्य, व्यवहार के तरीके और नगरीय संरचना से है। कहने का तात्पर्य यह है कि नगरीय एक प्रकार से नगरीय जीवन पद्धति है।

जिसमें यह तय किया गया है कि नगर में रहने वाले लोगों का अन्य लोगों के साथ कैसा व्यवहार होगा और उनके संस्कार क्या होंगे? वास्तव में, सामाजिक मूल्य की प्रकृति पूर्व निर्धारित है। जिसे अक्सर शहर में रहने वाला हर शख्स फॉलो करता है।

नगरीयता का अर्थ :-

नगरीयता एक जीवन पद्धति है। जो शहरों में रहने वाले लोगों के लिए जीवन का एक तरीका है। नगरीयता के संबंध में, यह कहा जा सकता है कि यह एक आधुनिक जीवन शैली के साथ जीवन का एक तरीका है, जो प्राथमिक संबंधों के विपरीत द्वितीयक संबंधों पर आधारित है, जिसमें आदर्शों, सामाजिक-सांस्कृतिक आदर्शों और मूल्यों की एक समन्वित सामाजिक व्यवस्था शामिल है।

नगरीयता की परिभाषा :-

अनेक विद्वानों और समाजशास्त्रियों ने नगरीयता के संदर्भ में भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ दी हैं। जिसकी परिभाषा प्रमुख समाजशास्त्रियों की परिभाषा निम्नलिखित है।

“नगरीयता जीवन के रहन-सहन के ढंग के रूप में केवल नगरों और शहरों को ही अपने अन्दर नहीं समेटता, बल्कि वह राजधानी जैसे महानगरों से दृष्टिगोचर होती है कि यह एक व्यवहार करने का तरीका है।”

एण्डरसन

“नगरीयता जीवन के रहन-सहन के ढंग को है जो सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से नगरीय रहन-सहन में जटिलता को लाता है, जो जनसंख्या के आकार में परिवर्तन, घनत्व और विषमता को निर्धारित करता है। व्यक्ति के व्यवहार और नगरीय परिवेश में सोचने के ढंग आदि में परिवर्तन लाता है। जहां लोग विभिन्न समुदायों के बीच से एक नए नगरीय समुदाय का निर्धारण करते हैं।”

लुईस बर्थ

“नगरीयता एक जीवन पद्धति है। यह समाज एक ऐसा संगठन है जिसमें श्रम का जटिल विभाजन, प्रौद्योगिकी के ऊँचे स्तर, उच्च गतिशीलता, आर्थिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए उसके सदस्यों की पारस्परिक निर्भरता और सामाजिक संबंधों में अवैयक्तिकता का समावेश होता है।”

थिओडर्स

“नगरीयता नगर निवास की परिघटना है।”

क्वीन एवं कारपेंटर

नगरीयता की विशेषताएं :-

नगरीयता की विशेषता के संदर्भ में अनेक समाजशास्त्रियों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से अपने विचार व्यक्त किए हैं। प्रमुख समाजशास्त्रियों द्वारा दी गई नगरीयता की विशेषताओं को निम्नलिखित आधारों पर समझा जा सकता है।

एंडरसन नगरीयता की तीन विशेषताओं को सूचीबद्ध करता है:-

  • समंजननीयता
  • गतिशीलता
  • प्रसार

रुथ ग्लास ने नगरीयता की निम्नलिखित विशेषताओं का वर्णन किया है।

  • गतिशीलता
  • व्यक्तिवाद
  • गुमनामीपन
  • सामाजिक विभेदीकरण
  • अवैयक्तिक संबंध
  • अस्थायित्व और यांत्रिक एकता

लुईस बार्थ ने नगरीयता की चार विशेषताओं का वर्णन किया है।

स्थिरता –

एक शहरवासी अपने परिचितों को भूल कर नए लोगों से संबंध बनाता रहता है। क्लब आदि समूहों के सदस्यों की तुलना में उसके अपने पड़ोसियों के साथ अधिक मैत्रीपूर्ण संबंध नहीं हैं। इसलिए, उनके जाने से उसे कोई चिंता नहीं है।

सतहीपन –

एक नागरिक कुछ ही लोगों के साथ बातचीत करता है और उनके साथ उसके संबंध अवैयक्तिक और अनौपचारिक होते हैं। व्यक्ति एक दूसरे से बेहद अलग भूमिकाओं में मिलते हैं। वे अपने जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक व्यक्तियों पर निर्भर रहते हैं।

गुमनामी –

नगरवासियों के आपस में घनिष्ठ संबंध नहीं होते। व्यक्तिगत पारस्परिक परिचितता जो आस-पड़ोस के लोगों में निहित है। शहर में नहीं है।

व्यक्तिवाद –

व्यक्ति अपने निहित स्वार्थों को अधिक महत्व देते हैं।

उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यद्यपि अनेक विद्वानों ने नगरीयता की विभिन्न विशेषताओं का उल्लेख किया है। परन्तु विशिष्ट जीवन शैली, विविधता, उपयोगितावाद, वर्ग भेद, गतिशीलता, व्यक्तिवाद एवं अस्थिरता के आधार पर नगरीयता की विशेषताओं की व्याख्या निम्नलिखित आधारों पर की जा सकती है:-

  • आत्मीयता के अभाव में नगरीयता में प्राथमिक सम्बन्धों की अपेक्षा द्वितीयक सम्बन्धों को अधिक महत्व दिया जाता है।
  • नगरीयता वास्तव में औद्योगीकरण का एक उत्पाद है। जिसमें पारंपरिक धार्मिक नियमों, संस्कृति, मूल्यों और आदर्शों का कोई विशेष स्थान नहीं है।
  • नगरीयता में भौतिक संस्कृति का अपना विशेष महत्व है। आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण के कारण शहरों में रहने वाले लोग आमतौर पर भौतिक संस्कृति में विश्वास रखते हैं। जिससे अभौतिक संस्कृति का धीरे-धीरे ह्रास होने लगता है।
  • नगरीयता जीवन में लोग सदैव स्वार्थ सम्बन्धों के आधार पर एक दूसरे से जुड़े रहते हैं अर्थात् व्यक्तियों के सम्बन्ध ‘हम’ के स्थान पर ‘मैं’ की भावना से जुड़े रहते हैं। लोग केवल उन्हीं लोगों के होते हैं जो उनके हितों को पूरा करने में सक्षम होते हैं।
  • नगरीय जीवन में जनसंख्या घनत्व अधिक होने के कारण व्यक्ति की व्यक्तिगत पहचान धीरे-धीरे लुप्त होने लगती है। अनौपचारिक सम्बन्धों के कारण व्यक्ति स्वार्थ सम्बन्ध ही स्थापित करता है। जिससे सामूहिक लगन और विशेषज्ञ संबंधों की भावना समाप्त होने लगती है।
  • नगरीयता जीवनशैली अपनाने के बाद व्यक्ति के व्यक्तित्व में कई बदलाव आते हैं, यानी नगरीयता एक तरह से सामाजिक और वैचारिक गतिशीलता को बढ़ावा देता है। क्योंकि व्यक्ति के बढ़ते संपर्क और वैचारिक स्वतंत्रता के कारण उसके विचार बदल जाते हैं। साथ ही दिन-ब-दिन सामने आने वाली नई-नई परिस्थितियों को भी व्यक्ति आसानी से अपना लेता है।
  • नगरीयता एक तरह से विशेषीकरण के विकास को प्रोत्साहित करता है। कार्य क्षेत्र विस्तृत होने के कारण व्यक्ति अपनी रुचि के क्षेत्रों में कार्य करने लगता है। जिससे कार्यों में धीरे-धीरे विशेषज्ञता आने लगती है। प्रत्येक कार्य विशेषज्ञ अपनी दक्षता और क्षमता के आधार पर नगरीय समाज में योगदान देता है और इस प्रकार व्यक्तियों के बीच श्रम का विभाजन भी होता है।

संक्षिप्त विवरण :-

शहरों में यदि कोई व्यक्ति शहरी विशेषताओं वाली जीवनशैली अपनाता है या उसी जीवनशैली में रहता है तो इसे नगरीयता कहा जाता है।

FAQ

नगरीयता क्या है?

नगरीयता की विशेषताएं बताइए?

Share your love
social worker
social worker

Hi, I Am Social Worker
इस ब्लॉग का उद्देश्य छात्रों को सरल शब्दों में और आसानी से अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराना है।

Articles: 546

Leave a Reply

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *